निर्भया

मेरे भी कुछ सपने थे,  जो मेरी इन अखियों ने बुने थे, मेरे माँ – बाबू की साँस थी मै ,उनके ताउम्र परिश्रम का ताप थी मैं .ज़िन्दगी जीने की हकदार थी मैं, कुछ बनने  की तमन्ना में ,हर मुश्किल से जूझ कर ,हर अश्क़ पीने को तैयार थी मैं .ना मालूम किस जुर्म की सज़ा मिली मुझे … Read More