अठखेलियां | #RhythmicWednesday

अठखेलियां-DayDream

आज अपने छज्जे पे बैठकर,
एक बार फिर देख रही थी आसमान,
कर रही थी बचपन की अठखेलियां।
ढूंढ रही थी बादलों में,
खरगोश का मुँह और फूलों की पंखुड़ियां।

आज फिर फ़ोन पे,
कर रही थी माँ से बात,
और सुन रही थी बचपन वाली कहानियां।
पंचतंत्र , गीता प्रेस, चम्पक और
बाल कृष्णा की शैतानियां।

आज फसे हुए उस ट्रैफिक जैम में,
याद कर रही थी,
बचपन की वो तरकीबें
जब सौ तक गिनने से,
चल पड़ती थी रेल और हम लगते थे हसने।

आज अपने छज्जे पे बैठकर,
एक बार फिर पी रही थी चाय की प्याली,
कर रही थी बचपन की अठखेलियां,
ढूंढ रही थी यादों की रेत में,
खिलखिलाहट के सीप और मोतियां।

Leave a Reply

CommentLuv badge

%d bloggers like this: