निर्भया


मेरे भी कुछ सपने थे, 

जो मेरी इन अखियों ने बुने थे, 
मेरे माँ – बाबू की साँस थी मै ,
उनके ताउम्र परिश्रम का ताप थी मैं .

ज़िन्दगी जीने की हकदार थी मैं, 

कुछ बनने  की तमन्ना में ,
हर मुश्किल से जूझ कर ,
हर अश्क़ पीने को तैयार थी मैं .

ना मालूम किस जुर्म की सज़ा मिली मुझे ,
कि न्याय पाने को तरस गए मेरे प्राण ,
ना रही मेरी अस्मत मेरी ,
ना ही रहा ये जीवन मेरे पास .

जा रही हूँ इस दुनिया से ,
दिल में ये उम्मीद लिए ,
कि मिले हर औरत को जीने की आज़ादी और न्याय ,
और ….  कभी भी ना जन्म ले – एक और निर्भया .
और ….  कभी भी ना जन्म ले – एक और निर्भया .

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