क्यूँ झट बड़े हो गए!

कल ही तो थे छोटे से ,
क्यूँ झट बड़े हो गए ।
बचपन की दहलीज लांघ कर ,
कब बचपने से दूर हो गए ।

ना रही वो बेफिकरी दुनिया ,
जो जीती थी संग गुड्डे गुड़िया।
एक टॉफी खुश कर देती थी ,
उस नन्हे से दिल को संतुष्ट करती थी ।

जब मम्मी सुनाती थी बाल कहानियां ,
और पापा के संग करते थे शैतानियां ।
जब ज़िंदगी थी सरल और सीधी ,
बुढ़िया के बाल भरते थे मिठास भीनी भीनी ।

भाई बहनो के साथ खेलते थे आँख मिचोली ,
कभी गुस्से में आ के शैतानियों की भी है पोल खोली ।
जब बरसात ले के आती थी रेनी डे ,
और रविवार का इंतज़ार होता था दिल से ।

वो दिन ही कुछ ख़ास थे ,
एक याद ही करा जाती है अलग एहसास ।
और हम पूछ बैठते है ,
कल ही तो थे छोटे से ,
क्यूँ झट बड़े हो गए ।

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