ज़ज्बात

चाँद सा नूर हो तुम ,
मेरे जीने का सुरूर हो तुम ।

हर पल सोचती हूँ तुम्हे इस क़दर ,
कि खुद की रहती ना कुछ ख़बर ।

तेरा अक्स रहे इन निगाहों में हर दम ,
आखें मीचे चलूँ तेरी ओर मै हर क़दम ।

तेरी बातें करती हैं मेरी ज़िंदगी को खुशनुमा ,
तुझे ही ऱब से माँगू मै हर घड़ी हर समां ।

तेरी हसी पर मैं वांरू सारा ज़हां ,
तू  जो हस दे तो माफ़ हो हर ख़ता ।

कभी सोचती हूँ जो तुम ना होते साथ ,
तो कितने बेमानी होते ये दिल और ये ज़ज्बात । 

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