नारी

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अर्धनारीश्वर की शक्ति है वो ,
स्रजनकर्ता की अद्भुत रचना ।

माँ के रूप में ममता की सूरत ,
निश्छल प्यार की वो दैवीय मूरत । 

ठान ले तो बन जाये शक्ति ,
करे दानवों की जीवन से मुक्ति । 

स्रष्टि के सृजन का अभिन्न अंग ,
अपनी उदारता से कर दे वो विश्व को दंग । 

कोमलता में हारे पुष्प भी उससे ,
ठान ले बने चट्टान सी अडिग । 

बिन उसके ना करे देवता वास ,
गृहलक्ष्मी बन मिटाए सबके त्रास । 

दुर्गा और काली का  अद्भुत रूप  है वो ,
हाँ .. क्यूंकि नारी है वो । 

2 comments on “नारी”

  1. Reply

    Good one…

  2. Reply

    Thanks Amit 🙂

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